प्रेमचंद की रचनाओं में सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण

Authors

  • के एम तरुणा देवी शोधार्थी, हिंदी विभाग, महाकौशल विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश, भारत Author
  • डॉ. श्वेता गर्ग सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, महाकौशल विश्वविद्यालय, जबलपुर, मध्य प्रदेश, भारत Author

Keywords:

प्रेमचंद, सामाजिक विषमता, मानवीय संवेदना, हिंदी साहित्य, यथार्थवाद, किसान-जीवन, नारी-विमर्श

Abstract

मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के उस युगांतरकारी हस्ताक्षर हैं जिन्होंने कथा-साहित्य को दरबारी विलासिता और रोमानी कल्पना से निकालकर आम जनमानस, विशेषतः किसान, स्त्री और शोषित वर्ग के यथार्थ जीवन-संघर्ष से जोड़ा। प्रस्तुत शोध-पत्र पूर्व में हुए अकादमिक अध्ययनों, आलोचनात्मक लेखों और शोध-प्रबंधों की व्यवस्थित समीक्षा (मेटा-विश्लेषण) के माध्यम से यह समझने का प्रयास करता है कि प्रेमचंद की रचनाओं—विशेषकर गोदान, गबन, रंगभूमि, निर्मला, कर्मभूमि तथा उनकी प्रमुख कहानियों में सामाजिक विषमता (जातिगत भेदभाव, आर्थिक शोषण, स्त्री-उत्पीड़न, सामंती दमन) और मानवीय संवेदनाओं (करुणा, आत्मसम्मान, त्याग, विद्रोह) का चित्रण किस प्रकार हुआ है।[1] अध्ययन में गुणात्मक विषयवस्तु-विश्लेषण पद्धति अपनाई गई है, जिसके अंतर्गत विगत छह दशकों में प्रकाशित प्रमुख हिंदी एवं अंग्रेज़ी आलोचनात्मक स्रोतों को विषयगत रूप से वर्गीकृत कर उनका तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। पत्र में प्रेमचंद-साहित्य पर हुए शोध की मात्रात्मक प्रवृत्तियों, प्रमुख आलोचकों के दृष्टिकोणों में भिन्नता, तथा अनुसंधान में विद्यमान रिक्तियों (गैप्स) को भी रेखांकित किया गया है।[2] निष्कर्षतः यह पाया गया कि प्रेमचंद का साहित्य केवल सामाजिक दस्तावेज़ नहीं बल्कि मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना का सशक्त माध्यम है, तथा उनकी प्रासंगिकता आज भी असमान भारतीय समाज-व्यवस्था के संदर्भ में अक्षुण्ण बनी हुई है। यह समीक्षा भविष्य के शोधार्थियों के लिए एक संदर्भ-आधार तैयार करती है।

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Published

2025-03-29

How to Cite

के एम तरुणा देवी, & डॉ. श्वेता गर्ग. (2025). प्रेमचंद की रचनाओं में सामाजिक विषमता और मानवीय संवेदनाओं का चित्रण. INTERNATIONAL JOURNAL OF MANAGEMENT RESEARCH AND REVIEW, 15(1), 306-315. https://ijmrr.com/index.php/ijmrr/article/view/785