कृषि ऋण एवं सहकारी संस्थाओं के माध्यम से कृषक सशक्तिकरण: एक क्षेत्रीय अध्ययन
Keywords:
सहकारी समिति; कृषि विकास; बेमेतरा; प्राथमिक कृषि साख समिति (पैक्स); ग्रामीण अर्थव्यवस्था; छत्तीसगढ़; कृषि ऋणAbstract
भारत में कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, और सहकारी समितियाँ किसानों को संस्थागत सहयोग प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम रही हैं। प्रस्तुत समीक्षा शोध-पत्र छत्तीसगढ़ राज्य के बेमेतरा जिले के विशेष संदर्भ में कृषि विकास में सहकारी समितियों की भूमिका का विश्लेषण करता है। यह अध्ययन विशुद्ध रूप से द्वितीयक स्रोतों—पूर्व प्रकाशित शोध-पत्रों, सरकारी प्रतिवेदनों तथा सहकारिता विभाग के दस्तावेजों—पर आधारित एक समीक्षात्मक एवं मेटा-विश्लेषणात्मक अध्ययन है, जिसमें विगत दो दशकों में प्रकाशित साहित्य का व्यवस्थित पुनरावलोकन किया गया है। धान उत्पादन के लिए प्रसिद्ध बेमेतरा जिले में प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियाँ (पैक्स) किसानों को अल्पकालिक ऋण, बीज, उर्वरक, भंडारण तथा उपज के विपणन जैसी अनेक सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं। साहित्य समीक्षा से स्पष्ट होता है कि सहकारी समितियों ने छोटे एवं सीमांत किसानों की संस्थागत साख तक पहुँच बढ़ाने, महाजनी शोषण को कम करने तथा सामूहिक सौदेबाजी की शक्ति प्रदान करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है, किंतु प्रशासनिक अकुशलता, राजनीतिक हस्तक्षेप, अपर्याप्त पूँजी आधार, अनियमित ऋण वसूली तथा तकनीकी पिछड़ेपन जैसी अनेक चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। यह पत्र पूर्व अध्ययनों का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए मौजूदा शोध अंतराल को रेखांकित करता है तथा नीति-निर्माताओं, सहकारिता विभाग एवं भावी शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी दिशा-निर्देश सुझाता है। निष्कर्षतः, सहकारी समितियों का संस्थागत सुदृढ़ीकरण, डिजिटलीकरण, पेशेवर प्रबंधन तथा जवाबदेही आधारित शासन प्रणाली, बेमेतरा जैसे कृषि-प्रधान जिलों में सतत एवं समावेशी कृषि विकास सुनिश्चित करने हेतु अनिवार्य प्रतीत होती है।
